ईवीएम आपकी और सरकार भी आपकी?

उत्तर प्रदेश में बुरे तरीके से चुनाव हारने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने ईवीऍम मशीन में गड़बड़ होने का आरोप लगाया। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इन आरोपों की जांच करने की बात कही। सिर्फ मायावती ही नहीं, इस से पहले भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी भी ईवीऍम मशीन में गड़बड़ होने का आरोप 2009 में लगा चुके हैं। तो क्या सच में इन आरोपों में कुछ दम है या ये खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे वाली बात है? हम सबसे पहले ये जानते हैं कि आखिर इन मशीनों को बनाता कौन है, ये मशीनें दो सरकारी कंपनियों इलेक्ट्रॉनिक कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड द्वारा बनाई जाती हैं। यह कंपनियां चुनाव आयोग नहीं बल्कि केंद्र सरकार के अंतर्गत काम करती हैं। चुनाव आयोग ने कहा है कि 1990 में और 2006 में उसने एक्सपर्ट्स से इसकी जांच करवाई है लेकिन जब मैंने उस जांच के बारे में पढ़ा तो बड़ी ही हैरान करने वाली जानकारियां मिली क्योंकि निर्माता कंपनी ने मशीन के सोर्स कोड तो एक्सपर्ट्स कमेटी के साथ साझा ही नहीं किये और न ही एक्सपर्ट्स को कंप्यूटर का कोई खासा ज्ञान था।

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अब सवाल यहाँ पर ये उठता है कि बिना सोर्स कोड के एक मशीन के सॉफ्टवेयर की अच्छे से जांच कैसे की जा सकती है? यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन और नेट इंडिया के वैज्ञानिकों ने अपने पेपर “सिक्योरिटी एनालिसिस ऑफ़ इंडियन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन” में लिखा है कि आसानी से इस वोटिंग मशीन की सिक्योरिटी को ध्वस्त करके चुनाव परिणामों को प्रभावित किया जा सकता है। असम के जोरहाट जिले में साल 2014 में एक ऐसी वोटिंग मशीन पकड़ी गई थी जिस में आप किसी को भी वोट डालें, लेकिन वो वोट बीजेपी के खाते में ही काउंट होती थी, बाकि कई जगहों पर भी ऐसी घटनाएं घटित होती रही हैं। उत्तर प्रदेश के चुनाव के दैरान भी इलाहबाद की सोरांव विधानसभा पर एक हैरतअंगेज वाक्या सामने आया जब एक बूथ पर 11 बजे चेकिंग के दैरान ये पता चला कि 2699 वोट पड़ चुकी हैं जबकि उस बूथ पर कुल वोटो की संख्या मात्र 1080 थी। जब यह मामला गरमाया तो इस मामले की जांच का आश्वासन दे कर इसे रफा दफा कर दिया गया। जर्मनी, आयरलैंड, नीदरलैंड, इंग्लैंड, फ़्रांस और इटली जैसे देशों ने तो इस इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग को असैंविधानिक करार दे कर इन्हें ख़ारिज कर दिया क्योंकि इनके नतीजों को आसानी से बदला जा सकता है। जब इतने टेक्निकली एडवांस देश भी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग को ख़ारिज करके पेपर वोटिंग के माध्यम से ही वोटिंग कराते हैं तो हमारे हिंदुस्तान की केंद्र सरकारें क्यों इन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के साथ चिपकी हुई हैं?

बात सिर्फ बीजेपी के केंद्र सरकार पर आरोप लगने की नहीं है बल्कि इस से पहले कांग्रेस की केंद्र सरकार पर ऐसे आरोप लग चुके हैं, जब वोटिंग मशीनों का निर्माण करने वाली कंपनी केंद्र सरकार के नियंत्रण में हैं तो केंद्र सरकारों द्वारा हस्तक्षेप का खतरा बना रहता है। एक अन्य सवाल यह भी है कि अगर आपने कल के नतीजों पर ध्यान दिया हो तो उत्तर प्रदेश के 403 सीटों के नतीजों के रुझान तो 2 ही घंटे में आ गए लेकिन गोवा और मणिपुर की सभी 40 और 60 सीटों पर रुझान आने 3 बजे तक शुरू हुए, ऐसा कैसे हो सकता है कि 403 की गिनती सिर्फ 2 घण्टे में जबकि 40 सीटों की गिनती में 7 घण्टे जब दोनों जगह मशीनें एक जैसी हैं। कुछ साथी कह सकते हैं कि अगर मशीनों में गड़बड़ केंद्र सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश में करवाई जा सकती है तो पंजाब, बिहार और दिल्ली में क्यों नहीं? इसका जवाब ये है कि पहली बात गड़बड़ हर जगह नहीं करवाई जाया करती है और दूसरी बात उत्तर प्रदेश का महत्व हम सब जानते हैं। उत्तर प्रदेश में इतने प्रचंड बहुमत के बाद राज्यसभा में बीजेपी बहुमत में पहुँच जायेगी और कॉर्पोरेट के फायदे के लिए सभी बिल अब आसानी से पास करवा दिए जायेंगें। एक सवाल ये भी है कि अगर मोदी जी की लहर थी उत्तर प्रदेश में तो वो लहर मणिपुर, गोवा और पंजाब में क्यों नहीं थी? इसी तरीके से 2004 में वाजपेयी जी की बहुत जबरदस्त हवा थी लेकिन 2004 के चुनावी नतीजों ने सबको हैरान कर दिया था। इन मशीनों के जरिये बाहरी मुल्कों में बैठ कर हैकिंग के जरिये हमारे चुनाव प्रभावित करने की संभावना बनी रहती है। जब 6 लाख से ज्यादा भारतीयों के डेबिट कार्ड्स हैक किये जा सकते हैं तो इन मशीनों को हैक करके चुनाव नतीजों को प्रभावित करना कोई बड़ी बात नहीं है। ये इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें भारत के लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा है, जितनी जल्दी इन्हें हटाकर पेपर आधारित चुनाव करवाएं जाएंगे उतना ही बेहतर होगा।
#लेखक – #अभिमन्यु_कोहाड़

The views of the author is purely his own and Ladakh Express is not responsible for his that.

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