वैश्विक आतंकवाद की जड़ें।

मुसलमानों के पवित्र स्थान मदीना में अभी कुछ दिन पहले बम धमाके होने के बाद कुछ लोगों ने फेसबुक पर लिखा कि आतंकवादियों का इस्लाम से कोई लेना देना नही है क्योंकि ये तो मुसलमानों को भी मार रहे हैं, लोगों के ऐसे बयान बड़े ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं। ऐसे लोगों से मेरा एक सवाल है कि क्या इन आतंकवादियों का इस्लाम से रिश्ता होता अगर ये सिर्फ गैर मुसलमानों को मारते? क्या इन आतंकवादियों का इस्लाम से रिश्ता होता अगर ये सिर्फ शिया मुसलमानों को मार रहे होते? क्या इंसानियत का रोजाना क़त्ल करने वालों का किसी भी धर्म से कोई रिश्ता हो सकता है? ये एक बड़ा सवाल है जिसके बारे में सबको सोचना पड़ेगा। लोग कहते हैं की आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता लेकिन पूरे विश्व में रोजाना हो रहे आतंकी हमलों के बाद मुझे लगता है कि आतंकवाद धार्मिक कट्टरवादियों के समर्थन के बिना इतनी तेजी से नहीं फ़ैल सकता। तो सवाल अब यह आता है कि कौन से धार्मिक लोग आतंकवादियों का समर्थन करते हैं? कौन से वो लोग हैं जो अलक़ायदा, लश्कर ए तैयबा और इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकवादी संगठनों का समर्थन करते हैं। ये बड़े गंभीर सवाल हैं जिनका जवाब पता करना बड़ा जरुरी है। आज हर आतंकवादी हमले की कड़ी कहीं न कहीं वहाबियों से जा के जुड़ती है। चाहे बात आप ढाका में हुए हमलों की कर लें जहाँ पर युवा आतंकियों के दिमाग में आतंकवाद का जहर भरने का काम एक वहाबी और सलाफी ज़ाकिर नाइक का है जो की मुम्बई का रहने वाला है। चाहे बात आप इराक और सीरिया में रोजाना हो रहे कत्लेआम की कर लें, यहाँ इस कत्लेआम के पीछे सऊदी अरब समर्थित इस्लामिक स्टेट के आतंकवादी हैं जिनकी वहाबी विचारधारा है। चाहे बात आप भारत में होने वाले आतंकवादी हमलों की कर लें, ज्यादातर हमलों के पीछे लश्कर ए तैयबा का हाथ है और इस आतंकवादी संगठन को सारा पैसा सऊदी अरब से आता है। 2009 में विकिलीक्स द्वारा जारी किये गए केबल बताते हैं की लश्कर ऐ तैयबा और जमात उद दावा के चीफ हफ़ीज़ सईद को सारा पैसा सऊदी अरब से मिलता है। ये वो ही हफ़ीज़ सईद है जिसने मुम्बई में सन् 2008 में आतंकी हमले करवाये थे और 166 से ज्यादा निर्दोष लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी थी। अब मुद्दे की बात ये है कि पूरे विश्व में आतंकवाद फ़ैलाने वाले ये वहाबी लोग हैं कौन, कहाँ से आये ये लोग और किसने इन्हें बनाया था?

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इसकी शुरुआत होती है 18वीं शताब्दी से, जब ब्रिटिश साम्राज्यवाद अपने एक एजेंट “हेम्फेर” को मध्य पूर्व में इस आदेश के साथ भेजता है कि वो सारे तरीके ढूंढे जायें जिस से मध्य पूर्व के देशों को और उनके प्राकृतिक संसाधनों को हम अपनी गिरफ्त में ले सकें। तो एजेंट “हेम्फेर” ने कहा की सबसे बढ़िया तरीका है “फूट डालो और राज करो”। आगे बढ़ने से पहले ये समझना जरुरी है की उस क्षेत्र के 1740 में क्या हालात थे जिसे हम आज सऊदी अरब के नाम से जानते हैं। उस समय यह एक पठार मात्र था जिसमे “बेदोयूं” नाम की जनजाति के लोग रहते थे। इस जनजाति में एक कबीला था जिसका सरदार “इब्न सऊद” था। उस समय तक कबीले एक दूसरे से लड़ते रहते थे। उस समय एक कट्टरवादी “अदल अल वहाब” की मुलाकात “इब्न सऊद” से हुई और “इब्न सऊद ने सोचा की क्यों न वहाब की इस कट्टरवादी सोच को आधार बना के पूरे पठार पर कब्ज़ा कर लिया जाये। इब्न सऊद और अदल अल वहाब में उस समय यह समझौता हुआ कि इब्न सऊद राजनीतिक मसले को देखेगा और अदल अल वहाब धार्मिक द्वेष का ज़हर लोगों के मन में घोलेगा और दोनों एक दूसरे के काम में दखल नहीं देंगे। अदल अल वहाब कहता था की सन् 950-1000 के बाद से इस्लाम में जो भी विकास हुआ वह गलत है और इसे बदलने की जरुरत है। इसलिए जो लोग उस समय उनकी बात से सहमत नही थे, उनका अदल अल वहाब ने क़त्ल करवा दिया। इस तरीके से पूरे पठार पर इब्न सऊद और अदल अल वहाब का कब्ज़ा हो गया। इसके बाद तुर्की और इजिप्ट ने अल सऊद और अदल अल वहाब को शिकस्त दी लेकिन आखिरकार 1932 में ब्रिटेन की मदद से इन वहाबियों ने अपना एक देश स्थापित कर लिया जिसे आज हम सऊदी अरब के नाम से जानते हैं। 1932 के बाद से अब तक आतंकवाद को बढ़ावा देने के अलावा सऊदी अरब ने कुछ नही किया।

हिंदुस्तान के अंदर भी पिछले कई सालों से वहाबी विचारधारा का जहर यहाँ के नौजवान मुसलमानों में भरा जा रहा है। अब इस समस्या ने हिंदुस्तान के अंदर भी एक विकराल रूप धारण कर लिया है। पिछले कुछ सालों में लगभग 1700 करोड़ रुपया सऊदी अरब ने हिंदुस्तान के अंदर भेजा है वहाबियत का जहर हिंदुस्तान के समाज में घोलने के लिए। 12वीं शताब्दी के बाद से हिंदुस्तान में इस्लाम धर्म का आगमन हुआ जिसके तहत शुरुआत में हज़ारों सूफी संत ईरान और मध्य एशिया से हिंदुस्तान में आये और उसके बाद अब तक सूफी परम्परा ही भारत में रही है। सूफी संतों की मजारें भारत में हमेशा से हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे और एकता का प्रतीक रही हैं, हर साल यहाँ लाखों की संख्या में हिन्दू जाते हैं और मुसलमान भाइयों के साथ खड़े हो के दुआ मांगते हैं। हर साल लाखों की संख्या में हिन्दू चादर चढ़ाने निजामुद्दीन औलिया और अजमेर शरीफ दरगाह पर जाते हैं। लेकिन अब ये वहाबी विचारधारा का फैलाव इस सूफी परम्परा के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है। सऊदी अरब से आये 1700 करोड़ रुपए का इस्तेमाल करके वहाबी लोग नई मस्जिद खोल रहे हैं और उन के अंदर नौजवानों को कट्टरता का पाठ पढ़ा रहे हैं। भारत की इंटेलिजेंस ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक इस 1700 करोड़ में से 800 करोड़ रुपए का इस्तेमाल नई 4 वहाबी यूनिवर्सिटी खोलने के लिए किया जा रहा है, 400 करोड़ रुपए से 40 नई वहाबी मस्जिद बनाई जा रही हैं, 100 करोड़ रुपयों से पुरानी मस्जिदों के कर्ता धर्ताओं को खरीदने का काम ज़ारी है व् 300 करोड़ से वहाबी मदरसे खोले जा रहे हैं। भारत की आईटी राजधानी बैंगलोर में भी पिछले कुछ सालों में 40 से ज्यादा मस्जिदें वहाबी और सलाफी लोगों ने खोली हैं। दक्षिण भारत खासकर केरल में वहाबी विचारधारा बहुत ही खतरनाक तरीके से फ़ैल रही है जिसका नतीजा ये हैं कि वहां पर वहाबी नेता अबु बकर अल मुस्लिआर ने एक बेहद ही घिनौना बयान दिया की औरतें तो सिर्फ बच्चा पैदा करने की मशीन हैं, इस से ज्यादा कुछ नहीं। जब फातिमा ज़हरा अपने पिता हज़रत मोहम्मद के महल में आया करती थी तो हज़रत मोहम्मद साहब अक्सर उनके सम्मान में खड़े हो जाया करते थे और सभी को कहते थे की की नारी का सम्मान करना हमारा सबसे बड़ा धर्म है लेकिन इन वहाबी लोगों के अनुसार औरतें सिर्फ बच्चा पैदा करने की मशीन हैं, आप इन वहाबियों की गन्दी सोच का अंदाज़ा इस बयान से लगा सकते हैं।

ये वहाबी लोग मज़ारों को नही मानते और कहते हैं की मज़ार बनाना इस्लाम के खिलाफ है, इसलिए इन वहाबियों ने हज़ारों मज़ारों को नष्ट कर दिया है जिसमे 21 अप्रैल 1925 को हज़रत मोहम्मद साहब की बेटी फातिमा ज़हरा की मज़ार को गिराया जाना भी शामिल है। यहाँ पर एक बड़ा सवाल यह उठता है कि हज़रत मोहम्मद साहब की बेटी की मज़ार गिराने वाला क्या कोई मुसलमान हो सकता है?

आज के दिन हिंदुस्तान में लगभग 18 लाख मुसलमान वहाबी विचारधारा को मानते हैं, और सऊदी अरब के पेट्रो डॉलर की मदद से ये संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। इतिहास इस बात का गवाह है कि जहाँ जहाँ वहाबियत फैली है वहां वहां इसने इंसानियत को खत्म कर दिया है, अगर आज हमने इस विचारधारा को हिंदुस्तान में बढ़ने से नही रोका तो भविष्य में ये हमारे बहुसांस्कर्तिक और बहुधार्मिक समाज के लिए एक बड़ा खतरा बन जायेगी।

जो एक सबसे बड़ा खतरा अभी भारत के उत्तरी राज्य जम्मू और कश्मीर में मंडरा रहा है वो है बढ़ती वहाबी विचारधारा। भारतीय सेना के रिटायर्ड अधिकारी “अफसर करीम” के अनुसार पाकिस्तान वहाबी प्रचारकों को कश्मीर में भेज रहा है जिस से कश्मीर घाटी के अंदर कट्टरवाद बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है। आसिया अंद्राबी जैसी वहाबी कश्मीर घाटी के अंदर शरीया कानून लागु करने के सपने देख रही है और युवाओं को हिंसा के रास्ते पर धकेल रही है, वहीँ दूसरी तरफ ये अपने बेटे को मलेशिया में पढ़ा रही है। जैसे जैसे जम्मू और कश्मीर में वहाबियत फैली है, उसके परिणामस्वरूप वहां अलगाववाद भी बढ़ा है। जम्मू कश्मीर के सूफी कल्चर को इन वहाबी और अलगाववादी लोगों द्वारा पूर्ण रूप से तबाह करने की साजिश रची जा रही है, और वहाबियों की इस मुहिम को सारा पैसा सऊदी अरब से आ रहा है।

सऊदी अरब के पैसों पर पले हुए ज़ाकिर नाइक जैसे वहाबी उपदेशक आज हिंदुस्तान के बहुधार्मिक समाज के लिए एक सबसे बड़ा खतरा बन के उभरे हैं जो एक धर्म को दूसरे से श्रेष्ट बताते हैं। हिंदुस्तान में अनेक धर्म के लोग सदियों से शांति से रहते आये हैं लेकिन ये धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन कर के लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाना एक बड़ा खतरा बन के हमारे भारतीय समाज के सामने खड़ा है। ये धर्म परिवर्तन के लिए उकसाने का काम एक तरफ हिन्दू राईट विंग के लोग कर रहे हैं तो दूसरी तरफ ज़ाकिर नाइक जैसे वहाबी लोग। हिंदुस्तान का समाज महात्मा गांधी के सर्व धर्म समभाव के कांसेप्ट पर सदियों से चलता आया है और आगे भी ऐसे ही चल सकता है। इस कांसेप्ट के अंतर्गत एक इंसान का अपने धर्मं का सम्मान करना उसकी धार्मिक ज़िम्मेदारी है और दूसरे सभी धर्मों का सम्मान करना उसकी नैतिक ज़िम्मेदारी है। महात्मा गांधी जी कहते थे की नैतिक ज़िम्मेदारी धार्मिक ज़िम्मेदारी से बड़ी होती है। सऊदी हुकूमत से वहाबियत की सेवा के लिए किंग फैसल मेडल पाने वाले ज़ाकिर नाइक इस हिंदुस्तान की सर्व धर्म सम्भावि समाज के लिए बड़ा खतरा बन के सामने आये हैं। आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ पिछले 4 साल में ज़ाकिर नाइक को 15 करोड़ रुपए सऊदी अरब से प्राप्त हुए हैं।

अगर समय रहते इस वहाबी विचारधारा को हिंदुस्तान से खत्म नही किया गया तो भविष्य में ये हिंदुस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा और समाज के लिए एक बड़ा खतरा बन के उभरेगी।

By Abhimanyu Kohar

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नोटबंदी पर सवाल और मोदी जी द्वारा अब तक कोई तार्किक जवाब नहीं।

हमारे प्रधानमंत्री जी नोटबंदी को लेकर सिर्फ वहां बयानबाजी कर रहे हैं जहाँ उनसे कोई सवाल पूछने वाला नहीं है और बयानबाजी भी बिना किसी तर्क की कर रहे हैं। वो संसद में उपस्थित रह कर नोटबंदी के ऊपर उठ रहे सवालों के जवाब नहीं दे रहे हैं क्योंकि वो जानते हैं कि यहाँ उनसे सवाल पूछे जा सकते हैं। संसद लोकतंत्र की आत्मा है और अगर वो संसद में उठ रहे सवालों का जवाब नहीं दे रहे हैं तो इसका अर्थ है कि वो निश्चित रूप से सांविधानिक संस्था को सम्मान नहीं दे रहे हैं।

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मोदी जी बाहर जाकर रैलियों में कह रहे हैं कि उन्हें संसद में बोलने नहीं दिया जाता, उनकी इस बात पर सवाल यह खड़ा होता है कि पार्लियामेंट में पूर्ण बहुमत होने के बावजूद अगर वो बोल नहीं पाते हैं तो वो एक कमज़ोर नेता हैं और अगर भारत का नेता इतना कमज़ोर होगा तो देश आगे कैसे बढ़ेगा? कैसे देश तरक्की करेगा? अगर संसद और उसमें उठने वाले सवालों से उन्हें इतनी ही समस्या है तो वो संसद की सदस्यता को छोड़ क्यों नहीं देते हैं और सामाजिक नेताओं की तरह सिर्फ बाहर जा कर काम करें और खूब भाषण दें, लेकिन अब जब वो संसद के सदस्य हैं तो उन्हें जवाब संसद में देना ही पड़ेगा।

बाहर जाकर भी अब तक तथ्यों के आधार पर जनता को यह नहीं समझा पा रहे हैं वो कि ये नोटबंदी कैसे फायदेमंद है। चलिये अगर वो संसद में जवाब नहीं देना चाहते हैं वो वो तटस्थ आर्थिक और सामाजिक पैनलों का जवाब दें जिनका राजनितिक पार्टियों से कोई लेना देना नहीं हो ताकि देश को पता तो चले कि आखिर किस तरह से ये नोटबंदी देश के लिए फायदेमंद है।

सुप्रीम कोर्ट में सरकारी वकील ने कहा था कि लगभग 6.5 लाख करोड़ काला धन नगदी के रूप में हिंदुस्तान की आर्थिक व्यवस्था में है तो ये 14.83 लाख करोड़ में से सिर्फ 8.33 लाख करोड़ रुपए बैंकों में आना चाहिए था लेकिन 13 लाख करोड़ से भी ज्यादा बैंकों के अंदर आ चुके हैं तो काला धन कहाँ पकड़ा गया? जवाब दे सरकार? सेंटर फॉर मोनेटरिंग ऑफ़ इंडियन इकॉनमी की रिपोर्ट के अनुसार इस नोटबंदी पर 1.28 लाख करोड़ का खर्चा आएगा और देश की इकॉनमी 1 महीने में .5 प्रतिशत सिकुड़ चुकी है तो इस तरीके से मार्च तक 2.0 तक सिकुड़ जायेगी जिसका अर्थ है 3 लाख करोड़ का नुकसान। तो देश को कुछ फायदा होने की जगह उल्टा 4.28 लाख करोड़ का नुकसान हो गया, कहीं ऐसे सवालों के जवाब न देने के लिए मोदी जी संसद से तो नहीं भाग रहे हैं? नोटबंदी पर तार्किक सवाल उठाने वालों की तुलना प्रधानमंत्री जी कभी पाकिस्तान से करते हैं तो कभी आतंकवादियों से तो कभी बेईमानों से। क्या मोदी जी का ऐसा व्यहवार प्रधानमंत्री पद की गरिमा के अनुरूप है?

मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश का विकास हुआ हो या नहीं, कालाधन वापस आया हो या नहीं, देश की सामरिक स्थिति मजबूत हुई हो या नहीं लेकिन उन्माद और कड़वाहट की राजनीति निश्चित रूप से जरूर बढ़ी है। जो लोग संसद में नोटबंदी को लेकर सवाल उठा रहे हैं वो खुद एक संस्थान का प्रतिनिधित्व करते हैं, और प्रधानमंत्री जी भी एक संस्थान का नेतृत्व करते हैं, अगर इस तरीके से एक संस्थान दूसरे संस्थानों द्वारा उठाये जा रहे सवालों का जवाब न देकर सिर्फ खिल्ली उड़ाएगा तो निश्चित रूप से लोकतंत्र कमजोर होगा। नोटबंदी के बाद से सिर्फ 47 दिनों में 60 बार नियमों में बदलाव करना सरकार की कार्यशैली को खुद बयान कर रहा है, जब तक इस तरह का वन मैन शो जारी रहेगा तब तक सरकार ऐसी गलतियां करती रहेगी।

यह बार बार नियमों में बदलाव दिखाता है कि यह जल्दबाज़ी और उत्तेजना में लिया हुआ फैसला है न कि सोच समझकर लिया हुआ फैसला। देश इस तरह की उत्तेजना और उन्माद की राजनीति से लंबे समय तक नहीं चल सकता है। समय की जरुरत है कि सरकार अपनी इस कार्यशैली में बदलाव करें और सांविधानिक संस्थाओं का सम्मान करें क्योंकि लोकतंत्र की आत्मा संविधान में होती है।

ये शोध अभिमन्यु कोहार ने लिखी है जो भारत में युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है।

रुसी राजदूत अलेक्जेंडर कदाकिन का निधन भारत-रूस के मधुर सम्बन्धों के लिए एक बड़ी क्षति।

भारत में रूस के राजदूत अलेक्जेंडर कदाकिन की मृत्यु भारत-रूस के घनिष्ट संबंधों के लिए एक बड़ी क्षति है। अलेक्जेंडर कदाकिन का कल दिल का दौरा पड़ने से नई दिल्ली के एक अस्पताल में निधन हो गया। 1971 में वो एक जूनियर डिप्लोमेट के तौर पर पहली बार हिंदुस्तान आये थे। उस समय वो तीसरे सेक्रेटरी के तौर पर उनकी डिप्लोमेट के तौर पर पहली नियुक्ति थी। उनकी ज़िन्दगी के एक बड़ा हिस्सा भारत में बीता इसलिए वो भारत को अपना दूसरा घर बोलते थे।

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                                 Alexander Kadakin

50 के दशक के हिंदी सिनेमा के कई गाने उनको याद थे और वो अक्सर उन्हें गुनगुनाते रहते थे। वह हिंदी बहुत सरलता से बोलते थे। वो हमेशा भारत-रूस के मज़बूत संबंधों के हिमायती रहे। बहुत सारे उनके यादगार बयानों में से एक आखिरी यादगार बयान “पाकिस्तान द्वारा कब्जाए गये भारत के राज्य जम्मू कश्मीर के हिस्से में भारत के सेना द्वारा की गयी सर्जिकल स्ट्राइक का वो पूर्ण समर्थन करते हैं” था और भारत के प्रति उनके इस प्यार की वजह से ही उनके हर भारतीय नेता से मधुर सम्बन्ध थे।

वो 1999 से 2004 और 2009 से अब तक भारत में रूस के राजदूत रहे थे। 1999 के कारगिल युद्ध के दैरान भी उन्होंने भारतीय वायुसेना को रुसी इंटेलिजेंस द्वारा आतंकियों के कॉर्डिनेट्स दिलवाने में अहम भूमिका निभायी थी। वो रूस-पाकिस्तान के सम्बन्धों की हिमायत करने वाले ज़ामिर काबुलोव के तीखे विरोधी रहे और वो रूस-पाकिस्तान के बढ़ते सम्बन्धों के खिलाफ थे।

ज़ामिर काबुलोव का मानना है कि अफ़ग़ानिस्तान में मॉडरेट तालिबान से बात करना रूस के हित में है, वहीँ दूसरी तरफ एम्बेसडर कदाकिन का मानना था कि ऐसी मॉडरेट तालिबान नाम की कोई चीज़ नहीं है और आतंकवाद का मतलब आतंकवाद है, उसे मॉडरेट के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। भारत-रूस के अच्छे सम्बन्धों के लिए काम करने की वजह से उन्हें रुसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन द्वारा “आर्डर ऑफ़ फ्रेंडशिप” अवार्ड द्वारा नवाज़ा गया था। एम्बेसडर अलेक्जेंडर कदाकिन को आने वाली पीढियां भारत के महान मित्र के तौर पर याद किया करेंगी।

इस शोध अभिमन्यु कोहार ने लिखी है जो भारत में युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है।

गेहूं से आयात शुल्क हटाना मोदी सरकार का एक किसान विरोधी व आत्मघाती फैसला है।

मोदी सरकार ने अब चंद दिन पहले गेहूं से आयात शुल्क हटाने का फैसला लिया है जिसने उत्तर भारत के किसानों की रीढ़ तोड़ दी है, इस फैसले के बाद किसानों में एक निराशा का माहौल है। इस फैसले से मोदी सरकार की किसान विरोधी छवि पुख्ता हो रही है जिसकी शुरुआत भूमि अध्यादेश से हुई थी। आयात शुल्क हटने के बाद लाखों टन गेहूं विदेश से हिंदुस्तान में आना शुरू हो गया है, इस गेहूं के आयात से भारत के किसानों द्वारा पैदा किये जा रहे गेहूं की कीमत घट जायेगी और उन्हें न्यूनतम निर्धारित मूल्य से कम में अपना गेहूं बेचना पड़ेगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सच में 70 के दौर की हरित क्रांति के बाद हमे विदेश से गेहूं के आयात करने की जरुरत है?

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आंकड़ों के अनुसार हिंदुस्तान में हर साल गेहूं की खपत है 87 मिलियन टन, जबकि इस वर्ष 93.5 मिलियन टन गेहूं की पैदावार का अनुमान है जो की जरुरत से 6.5 मिलियन टन ज्यादा है। तो सवाल यह उठता है कि आख़िरकार हमे क्या ज़रूरत है गेहूं का विदेशों से आयात करने की? जब जरुरत से ज्यादा पैदावार हमारे देश में ही हो रही है तो क्यों सरकार बाहर से गेहूं मंगवा के किसानों को बर्बाद करने पर तुली हुई है?

भारत के किसानों की पश्चिमी देशों के किसानों से तुलना करना बिलकुल गलत है और पूर्ण रूप से अव्यवहारिक है क्योंकि पश्चिमी देशों की सरकार वहां के किसानों को अरबों रुपए की सब्सिडी सीधे तौर पर देती है। पश्चिमी देशों के किसान को फसल के मूल्य से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वहां की सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी ही वहां के किसानों के आरामदायक जीवन जीने के लिए पर्याप्त है। वहीं दूसरे और भारत के किसानों को ना के बराबर सब्सिडी सरकार से प्राप्त होती है।

सिर्फ साल 2010 में यूरोपियन यूनियन ने अपने किसानों को 3.60 लाख करोड़ की सब्सिडी सीधे तौर पर दी थी, वहीँ अमरीका हर साल 1.20 लाख करोड़ की सब्सिडी अपने किसानों को देता है। जबकि भारत में स्थिति ये है कि लाखों करोड़ों रुपए का कॉर्पोरेट घरानों का लोन माफ़ कर दिया जाता है जबकि एक किसान का चंद हज़ार रुपए का क़र्ज़ माफ़ नहीं किया जाता। इस वजह से भारत और पश्चिम के किसानों की तुलना करना बिल्कुल भी उचित नहीं है।

भारत के किसान का जीवनयापन फसल के मूल्य पर निर्भर है जबकि पश्चिमी देश के किसानों का जीवनयापन सब्सिडी पर निर्भर है इसलिए पश्चिमी देशों के किसानों की फसल का मूल्य हमेशा कम ही रहेगा। इस तरह से गेहूं के आयात से एक और खतरा है और वो है हमारी आत्मनिर्भरता का समाप्त हो जाना, जिस तरीके से 90 के दशक में उस समय की सरकार ने खाद्य तेल पर आयात शुल्क को बहुत कम कर के हिंदुस्तान के नारियल व सूरजमुखी की खेती करने वाले किसानों को समाप्त कर दिया गया था, उसी तरीके से अब उत्तर भारत के किसानों के ऊपर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं। ये आयात शुल्क खत्म न कर के सरकार को गेहूं के उत्पादन के सही रख-रखाव की और ध्यान देना चाहिए क्योंकि हर वर्ष लाखों टन गेहूं खुले में रखे हुए खराब हो जाता है और वहीँ दूसरी और लाखों लोग हर साल भूखे मर जाते हैं। सरकार को कम से कम 35 फीसदी आयात शुल्क कर देना चाहिए जिससे हमारे यहाँ के किसानों को गेहूं का सही मूल्य मिल सके।

گندم سے ٹیرف ہٹانا مودی حکومت کا کسان مخالف اور خود کش فیصلہ

مودی حکومت نے اب چند دن پہلے گندم سے درآمد کی فیس ہٹانے کا فیصلہ لیا ہے جس نے شمالی ہند کے کسانوں کی ریڑھ کی ہڈی توڑ دی ہے، اس فیصلے کے بعد کسانوں میں ایک مایوسی کا ماحول چھایا ہوا ہے. اس فیصلے سے مودی حکومت کی کسان مخالف تصویر پختہ ہو رہی ہے جس کی شروعات زمین آرڈیننس سے ہوئی تھی. درآمد کی فیس ہٹنے کے بعد لاکھوں ٹن گندم بیرون ملک سے ہندوستان میں آنا شروع ہو گیا ہے، اس گندم کی درآمد سے بھارت کے کسانوں کی طرف سے پیدا کئے جا رہے گندم کی قیمت گھٹ جائے گی اور انہیں کم از کم مقررہ قیمت سے کم میں اپنا گندم فروخت کرنا پڑے گا.

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سب سے بڑا سوال یہ ہے کہ کیا سچ میں 70 کے دور کی سبز انقلاب کے بعد ہمیں بیرون ملک سے گندم کی درآمد کرنے کی ضرورت ہے؟

اعداد و شمار کے مطابق ہندوستان میں ہر سال گندم کی ضرورت ہے 87 ملین ٹن جبکہ اس سال 93.5 ملین ٹن گندم کی پیداوار کی اُمید کی جا رہی ہے جو کی ضرورت سے 6.5 ملین ٹن زیادہ ہے. تو سوال یہ اٹھتا ہے کہ آخرکار ہمیں کیا ضرورت ہے گندم بیرون ملک سے درآمد کرنے کی؟ جب ضرورت سے زیادہ پیداوار ہمارے ملک میں ہی ہو رہی ہے تو کیوں حکومت باہر سے گندم منگوا کے کسانوں کو برباد کرنے پر تلی ہوئی ہے؟

 بھارت کے کسانوں کی مغربی ممالک کے کسانوں سے موازنہ کرنا بالکل غلط ہے اور مکمل طور پر غیر عملی ہے کیونکہ مغربی ممالک کی حکومت وہاں کے کسانوں کو اربوں روپے کی سبسڈی براہ راست طور پر دیتی ہے. مغربی ممالک کے کسان کو فصل کی قیمت سے کوئی فرق نہیں پڑتا کیونکہ وہاں کی حکومت کی طرف سے دی جانے والی سبسڈی ہی وہاں کے کسانوں کے آرام دہ اور پرسکون زندگی کو رہنے کے لئے کافی ہے. وہیں دوسری اور بھارت کے کسانوں کو نا کے برابر سبسڈی حکومت سے حاصل ہوتی ہے.

صرف سال 2010 میں یورپین یونین نے اپنے کسانوں کو 3.60 لاکھ کروڑ کی سبسڈی براہ راست طور پر دی تھی، وہیں امریکہ ہر سال 1.20 لاکھ کروڑ کی سبسڈی آپنے کسانوں کو دیتا ہے. جبکہ ہندوستان میں صورت حال یہ ہے کہ لاکھوں کروڑوں روپے کا کارپوریٹ گھرانوں کا لون معاف کر دیا جاتا ہے جبکہ ایک کسان کا چند ہزار روپے کا قرض معاف نہیں کیا جاتا. اس وجہ سے بھارت اور مغرب کے کسانوں کے مقابلہ کرنا بالکل بھی مناسب نہیں ہے.

بھارت کے کسان کا گزر بسر فصل کی قیمت پر منحصر ہے جبکہ مغربی ملک کے کسانوں کا زندگی بسر سبسڈی پر انحصار ہے اس لئے مغربی ممالک کے کسانوں کی فصل کی قیمت ہمیشہ کم ہی رہے گا. اس طرح سے گندم کی درآمد سے ایک اور خطرہ ہے اور وہ ہے ہماری خود انحصاری کا ختم ہو جانا، جس طریقے سے 90 کی دہائی میں اس وقت کی حکومت نے خوردنی تیل پر درآمد کی فیس کو بہت کم کر کے ہندوستان کے ناریل اور سورج مکھی کی کاشت کرنے والے کسانوں کو ختم کر دیا گیا تھا،اسی طریقے سے اب شمالی بھارت کے کسانوں کے اوپر خطرے کے بادل منڈلانے لگے ہیں. یہ درآمد کی فیس ختم نہ کر کے حکومت کو گندم کی پیداوار کے حق رکھ رکھاؤ پر زیادہ توجہ دینا چاہئے کیونکہ ہر سال لاکھوں ٹن گندم کھلے میں رکھے ہوئے خراب ہو جاتا ہے اور وہیں دوسری اور لاکھوں لوگ ہر سال بھوکے مر جاتے ہیں. حکومت کو کم سے کم 35 فیصد درآمد کی فیس کردینا چاہئے جس سے ہمارے یہاں کے کسانوں کو گندم کی حقیقی قیمت مل سکے.

یہ مقالہ ابیمنیو کوہار نے لکھی ہے جو کہ ہندوستان میں جوانوں کی نمائندگی کرتا ہے۔

مسلم نیٹو – سامراج کا نیا ہتھیار

یہ 2 لفظ “مسلم نیٹو” سن کر شاید آپ حیرت میں پڑ گئی ہو گی۔ آخر یہ کیا ہے؟ اب 39 مسلم ممالک نے مل کر ایک نئی فوجی تنظیم بنائی ہے جس کا نام ہے “اسلامی الاينس ٹو فائڑ اگینسٹ ٹیرورزم” لیکن اس کے مقاصد کو جان کر اس کو اگر “مسلم نیٹو” بولا جائے تو یہ غلط نہیں ہوگا کیونکہ اس کا مقصد بھی و ہی ہے جو نیٹو کا ہے. یہ تنظیم بھی نیٹو کی طرح غریب ملکوں کے استحصال اور سامراجی پالیسیوں کو آگے بڑھانے کے لئے بنایا گیا ہے. ہمارا خیال ہے کہ یہ تنظیم نیٹو سے بھی زیادہ خطرناک ثابت ہوگا اگر یہ حقیقت بنتا ہے تو.

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ہمیں اس تنظیم کے بننے کے پیچھے کی کہانی کو سمجھنا تھوڑا ضروری ہے. اس تنظیم کی پہلی بار بات 2015 کے آخر میں سامنے آئی. واضح رہے کے 2015 کے آخر تک یہ صاف ہو گیا تھا کہ شام میں سعودی عرب کی حمایت دہشت گردوں کو بری شکست جھیلنی پڑے گی اور دوسری طرف یمنی لوگوں کے ہمت کے سامنے سعودی فوجی میدان چھوڑ کے بھاگ رہے تھے. تو اس وقت سعودی عرب کو بچائے رکھنے کے لئے اس تنظیم “مسلم نیٹو” کی بنیاد رکھی گئی.

اس تنظیم کے 3 چیزیں بڑی ہی حیران کرنے والی ہیں. سب سے پہلی یہ کی یہ تنظیم دہشت گردی سے لڑنے کی بات کرتا ہے لیکن دہشت گردی سے سب سے بری طرح متاثر دو ملک عراق اور شام کو اس میں شامل نہیں کیا گیا، تو کس طرح سے یہ دہشت گردی سے لڑنے کی بات کر رہا ہے؟ ایران کو بھی اس تنظیم میں شامل نہیں کیا گیا ہے، اس وجہ سے یہ ایک تکفیری زہنیت سے متاثر مسلمان ممالک کی تنظیم نظر آتا ہے جس کا اصلی مقصد مسلم ممالک کو شیعہ بمقابلہ سنی میں تقسیم ہے. اس تنظیم کی تعمیر کے بعد اس کے ممبر ممالک میں یہ شیعہ بمقابلہ سنی کی جنگ اب اور بھی زیادہ تیز ہوگی.

 دوسری بات اس تنظیم کا ہیڈ کوارٹر سعودی عرب کے دارالحکومت ریاض میں بنایا گیا ہے اور اس تنظیم کی اقتصادی ضروریات بھی سعودی عرب کی طرف سے ہی مکمل کی جائیں گی. اس بات سے یہ بات یقینی ہے کہ جس سعودی عرب نے بالواسطہ یا درپردہ طور پر دنیا کے زیادہ تر دہشت گردوں کو حمایت دی، وہ ہی سعودی عرب اپنی دارالحکومت میں ایک تنظیم کا ہیڈ کوارٹر بنا کے اب انہی دہشت گردوں سے لڑنے کی بات کر رہا ہے جنہیں اس نے خود پالا پوسا ہے. باقی رکن ممالک کا اس تنظیم کے مقاصد اور پالیسیوں پر کنٹرول نہ ہونے کے برابر ہو گا جن حالات میں اور جن طریقوں سے اس کا تعمیر ہو رہا ہے. تیسرا اہم نقطہ یہ ہے کہ سابق پاکستانی آرمی چیف ریٹائرڈ جنرل راهل شریف کو اس تنظیم کا پہلا کمانڈر مقرر کیا گیا ہے، یہ بات ہضم نہیں ہوتی کہ لشکر طیبہ، جیش محمد اور حزب المجاہدین جیسی دہشت گرد تنظیموں کو بنانے والی پاکستانی آرمی کا سابق چیف اب دہشت گردوں کے خلاف جنگ کی قیادت کرے گا. جس پاکستانی فوج کی ممبئی حملے میں ملوث ہوئے تھی، اس پاکستانی فوج کے سابق چیف دہشت گردی سے لڑنے کی بات کرے تو یہ بات ہضم نہیں ہوتی. یہ تنظیم دہشت گردوں کے خلاف لڑنے والی تنظیم ظاہر نہ ہو کر بلکہ ایک دہشت گردوں کی حمایت کرنے والی تنظیم ظاہر ہو رہا ہے. یہ تنظیم محض سعودی عرب کی وہابی پالیسیوں کی تکمیل کے لئے بنایا ہوا تنظیم نظر آ رہا ہے.

 یہ مقالہ ابی منیو کوہار نے لکھی ہے جو کہ ہندوستان میں نوجوان نسل کی قیادت کرتا ہے۔

मुस्लिम नाटो – साम्राज्यवाद का नया हथियार।

अभिमन्यु कोहर:

ये 2 शब्द “मुस्लिम नाटो” सुन कर शायद आप अचरज में पड़ गए हों की आखिर ये क्या है? अभी 39 मुस्लिम देशों ने मिल कर एक नया सैन्य संगठन बनाया है जिसका नाम है “इस्लामिक अलायन्स टू फाइट अगेंस्ट टेररिज्म” लेकिन उसके उद्देश्यों को जानकर इसे अगर “मुस्लिम नाटो” बोला जाये तो यह गलत नहीं होगा क्योंकि इसका उद्देश्य भी वो ही है जो नाटो का है। यह संगठन भी नाटो की तरह गरीब मुल्कों के शोषण और साम्राज्यवादी नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए बनाया गया है। हमारा मानना है कि यह संगठन नाटो से भी ज्यादा खतरनाक साबित होगा अगर यह हकीकत बनता है तो।
हमे इस संगठन के बनने के पीछे की कहानी को समझना थोड़ा जरुरी है। इस संगठन की पहली बार बात 2015 के आखिर में सामने आयी। ज्ञात रहे की 2015 के आखिर तक ये साफ़ हो गया था कि सीरिया में सऊदी अरब समर्थित आतंकवादियों को बुरी हार झेलनी पड़ेगी और दूसरी तरफ यमनी लोगों के साहस के सामने सऊदी सैनिक मैदान छोड़ के भाग रहे थे। तो इस समय सऊदी अरब को बचाये रखने के लिए इस संगठन “मुस्लिम नाटो” की आधारशिला रखी गयी।

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इस संगठन की 3 चीजें बड़ी ही हैरान करने वाली हैं। सबसे पहली यह की ये संगठन आतंकवाद से लड़ने की बात करता है लेकिन आतंकवाद से सबसे बुरी तरह प्रभावित दो देश इराक और सीरिया को इसमें शामिल नहीं किया गया, तो किस तरह से ये आतंकवाद से लड़ने की बात कर रहा है? ईरान को भी इस संगठन में शामिल नहीं किया गया है, इस वजह से यह एक सुन्नी देशों का संगठन नज़र आता है जिसका असली मकसद मुस्लिम देशों को शिया बनाम सुन्नी में बाँटना है। इस संगठन के निर्माण के बाद इसके सदस्य देशों में यह शिया बनाम सुन्नी की लड़ाई अब और भी ज्यादा तेज होगी।
दूसरी बात इस संगठन का हेडक्वार्टर सऊदी अरब की राजधानी रियाद में बनाया गया है और इस संगठन की आर्थिक जरूरतें भी सऊदी अरब द्वारा ही पूरी की जाएँगी। इस बात से यह बात निश्चित है कि जिस सऊदी अरब ने परोक्ष या अपरोक्ष तौर पर दुनिया के ज्यादातर आतंकवादियों को समर्थन दिया, वो ही सऊदी अरब अपनी राजधानी में एक संगठन का हेडक्वार्टर बना के अब उन्हीं आतंकवादियों से लड़ने की बात कर रहा है जिन्हें उसने खुद पाला पोसा है। बाकि सदस्य देशों का इस संगठन के उद्देश्यों और नीतियों पर कंट्रोल न के बराबर होगा जिन परिस्थितियों में और जिन तरीकों से इसका निर्माण हो रहा है।
तीसरा अहम बिंदु ये है कि पूर्व पाकिस्तानी आर्मी चीफ रिटायर्ड जनरल राहिल शरीफ को इस संगठन का पहला कमांडर नियुक्त किया गया है, यह बात हज़म नहीं होती कि लश्कर ए तैयबा, जैश ए मोहम्मद और हिज़्बुल मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी संगठनों को बनाने वाली पाकिस्तानी आर्मी का पूर्व चीफ अब आतंकवादियों के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करेगा। जिस पाकिस्तानी सेना की मुम्बई हमले में संलिप्तता थी, उस पाकिस्तानी सेना का पूर्व चीफ आतंकवाद से लड़ने की बात करे तो यह बात असम्भव लगती है।
यह संगठन आतंकियों के खिलाफ लड़ने वाला संगठन प्रतीत ना हो कर बल्कि एक आतंकवादियों का समर्थन करने वाला संगठन प्रतीत हो रहा है। यह संगठन सऊदी अरब की वहाबी नीतियों की पूर्ति के लिए बनाया हुआ संगठन मात्र है।